Friday, September 26, 2008

घर के लिए कुछ शिलालेख और ब्योरे

(1) घर
मध्ययुगीन कबीले
बीते जमानों की बात होगी कहीं
यहां नहीं
देखो ये नाखूनों और दांतों की विरासत
अभी-अभी तो कुचली गयी हैं अस्मिताएं
तभी ताजा हैं और लहूलुहान
देखो-देखो मेरी दुधमुंही बीमार बच्ची का दूध छीनकर
कैसे ठठाकर हँस रहा है राक्षस
इसकी आँखों की हब्शी चमक
कुछ याद दिलाती है तुम्हें ?
यह मेरा घर है
जहाँ पैदा हुआ मैं कुल कलंकी
आह ... मेरे पिता की सुंदर रचना !

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rajesh chandra
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