Saturday, September 6, 2008

एक जिरह जबरदस्ती

समय के ऐसे भारी दिनों में
जबकि नपुंसक होते जा रहे हैं शब्द
और सच बोलना सिर्फ गूंगों की जिम्मेदारी है
अखबार पटककर
गुस्से से खौल उठता है मेरा मित्र विनोद
-‘‘ईमानदार वही है जिसे अवसर नहीं मिला है।
‘‘ ऐसे भयावह दिनों में कैसे लिखी जायेगी
कोई सही कविता
आंदोलित करेगी किसे ?
अंधेरे गहरे कुएं में जीवन की कला चीख रही है
और जगत पर बैठा बाजार
’चाहूँ तो निकाल दूँ’-वाली अदा से मुस्कुराता है
और कहता है -’पहले कपड़े उतारो !’

एक ऐसे बर्बर समय में
जब नरभक्षी गिद्धों और इतिहास के प्रेतों के शोर से
पृथ्वी घूमती हुई भँवर बनी जा रही
और आकाश शीशे -सा पिघल रहा
तब फूलों और पत्तियों और प्रेमिकाओं
और व्यभिचार के गुदगुदाते सौन्दर्य पर
लिखने और बोलनेवाले मेरे समय के अभिजन
लेखक, पत्रकार, प्रोफेसर और कविगण,
कार, कॉर्डलैस और कंडोम से लैस हैं
दुराचारी सत्ता और जनता के बीच डैस हैं
इनके डूबने के लिए चुल्लू भर पानी
अब भी इसलिये कम है
क्योंकि इन्हें आत्मा का नहीं
थोड़ी सुविधाएँ और जुटा लेने का ग़म है।

समय की एक ऐसी घड़ी में
जबकि सर्वाधिक जरूरी चीजें
हटा दी गयी हैं प्राथमिकताओं की सूची से
और तमाम बुनियादी बातें
अश्लीलता और शर्म से भर गयी हैं
एक ऐसी घड़ी में जबकि देश के सर्वोत्तम दिमाग
और रचनात्मक प्रतिभाएं
किसी भी राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक समर में
घुसने से परहेज करती हैं
एक बार फ़िर जटिल और खुरदरे समय के
अपने प्रिय जटिल और खुरदरे कवि
मुक्तिबोध की जुबान में जुबान मिलाकर कहना चाहता हूँ
-’’हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए ?’
या कि मनुष्य होना अब भी एक संभावना है।
राजेश चन्द्र

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