Tuesday, September 4, 2007

बच्चों की दुनियां

दूबों की नोक पर कांपती
ओस की बूंदों-सी हल्की नींद
तितली के पंखों-से मुलायम
और भोर के रंगों वाले सपने ...

ओ मेरी माँ ...
आगामी किन सदियों में
(अथवा आख़िरी सदी तक भी क्या)
पृथ्वी के तमाम बच्चों के लायक होगी
पृथ्वी के तमाम बच्चों की यह दुनियां ?

राजेश चन्द्र

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