दूबों की नोक पर कांपती
ओस की बूंदों-सी हल्की नींद
तितली के पंखों-से मुलायम
और भोर के रंगों वाले सपने ...
ओ मेरी माँ ...
आगामी किन सदियों में
(अथवा आख़िरी सदी तक भी क्या)
पृथ्वी के तमाम बच्चों के लायक होगी
पृथ्वी के तमाम बच्चों की यह दुनियां ?
राजेश चन्द्र
ओस की बूंदों-सी हल्की नींद
तितली के पंखों-से मुलायम
और भोर के रंगों वाले सपने ...
ओ मेरी माँ ...
आगामी किन सदियों में
(अथवा आख़िरी सदी तक भी क्या)
पृथ्वी के तमाम बच्चों के लायक होगी
पृथ्वी के तमाम बच्चों की यह दुनियां ?
राजेश चन्द्र
0 comments:
Post a Comment