Wednesday, August 29, 2007

केंचुल

इस जटिल और लगातार बदलते समय में
ख़तरनाक है एक जैसा दीखना


सबसे मिल-मिलाकर चलना
और गोल-मोल बतियाना
बदलते समय की सबसे बड़ी समझदारी है।

वे समझते हैं इस बात को
और समझ कर चलते हैं।
पहले गढ़ते हैं फिर बोलते हैं
या बोलकर बाद में गढ़ते हैं।

सच को झूठ की और झूठ को सच की
पूरी गम्भीरता से रखते हुए
वे बड़े चौकन्ने होते हैं
उनका हर बयान
इतनी गुंजाइश हमेशा रखता है
कि समय आने पर कहा जा सके
मेरा मतलब यह नहीं था।

वे इतने घुटे हुए और परिपक्व हैं
कि विचारधाराएँ उनके लिए
विविधताओं से भरे बहुरंगी कंडोम हैं
जिन्हें वे एक खास वक़्त में
पहनते और उतारते हैं।

यों अपने पूरे वजूद और इतिहास में
एक स्खलन जीते हुए
वे शान से काट लेते हैं
बिना केंचुल छोडे अपनी तमाम उम्र।


राजेश चन्द्र

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