नस्लों और सभ्यताओं और भूगोल को
रौंदते चले आ रहे हैं जो,
जिनके खुरों तले नहीं बच रही है
रेत के कण जितनी भी धरती
कानी उंगली जितना भी आकाश
एक उन्मुक्त साँस भर भी हवा और
जी लेने जैसा भी कोई निर्दोष जीवन
आदिम समाजों के अँधेरे में
दबे पाँव घुस आने वाले
उन निरीह और भूखे जंगली भेड़ियों से अलग
जिन्हें खदेड़ आने के लिये उनकी आबादी में
बहुत कारगर थीं मशालें
ये बहुत ज़्यादा आधुनिक और हुनरमन्द
नए ज़माने के भेड़िये हैं।
ये नहीं आते अब कभी दबे पाँव
टाईकून की तरह आकर छा जाते हैं
और ऐसे बने रहते हैं
जैसे लगा रहता है कोई पुराना गुप्तरोग
जैसे नहीं जातीं लड़कपन की बुरी आदतें।
जैसे नहीं जातीं लड़कपन की बुरी आदतें।
उनके होने में बहुत सादा-सादा सा कालापन है
और जुबान में बहुत काली-काली सी सादगी
लक-दक पोशाकों में जगर मगर रोशनियों
और हाथ हिलाते पुतलों के बीच
ताजपोशी के लिये चले जा रहे है भेड़िये
और विश्वग्राम की भुक्खड़ जनता
अहर्निश चैनलों के सामने टकटकी लगाये बैठी है संज्ञाशून्य
देखती हुई खुदा में तब्दील होते भेड़ियों को।
विचारधाराएँ यों कहने को अब भी हैं मौजूद
और जनसंघर्षों की भी ज़ारी हैं बहुतेरी परियोजनाएँ बदस्तूर
पर सबसे बड़ा विचार है भेड़िया
यह कहना पहले से कहीं अधिक अब ज़रूरी नहीं रहा।
न्यूयार्क से लन्दन, इजराइल से पाकिस्तान,
बीझिंग से मास्को और भारत से संयुक्त राष्ट्र तक
भेड़ियों की इतनी बड़ी सफलताओं के पीछे
उनकी डील का सफल होना है
भेड़ियों की ताक़त और तादाद उम्मीद से अधिक बढ़ी है
कई पुराने विश्वस्त चेहरे, लड़ाकू विचार
अचानक इधर भेड़ियों में तब्दील हो गये हैं
और संसद से लेकर सड़क तक हर जगह
कई पुराने विश्वस्त चेहरे, लड़ाकू विचार
अचानक इधर भेड़ियों में तब्दील हो गये हैं
और संसद से लेकर सड़क तक हर जगह
चल रही है अगले ताज की डील
मेरे देश की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों की हालत
अब भी उसी मरखनी कुतिया जैसी है
जो अपनी पूँछ के नीचे झाँकने की जिद में
बासठ सालों से गोल गोल घूम रही है
यह जानने की निरर्थक कोशिश में
की उसकी पूँछ के नीचे ऐसा क्या ख़ास है
की ऐन जनतंत्र के महा मौसम में
अचानक बढ़ जाती है उसकी पूछ।