Friday, November 20, 2009

भेड़िये

नस्लों और सभ्यताओं और भूगोल को
रौंदते चले आ रहे हैं जो,
जिनके खुरों तले नहीं बच रही है
रेत के कण जितनी भी धरती
कानी उंगली जितना भी आकाश
एक उन्मुक्त साँस भर भी हवा और
जी लेने जैसा भी कोई निर्दोष जीवन
आदिम समाजों के अँधेरे में
दबे पाँव घुस आने वाले
उन निरीह और भूखे जंगली भेड़ियों से अलग
जिन्हें खदेड़ आने के लिये उनकी आबादी में
बहुत कारगर थीं मशालें
ये बहुत ज़्यादा आधुनिक और हुनरमन्द
नए ज़माने के भेड़िये हैं।
ये नहीं आते अब कभी दबे पाँव
टाईकून की तरह आकर छा जाते हैं
और ऐसे बने रहते हैं
जैसे लगा रहता है कोई पुराना गुप्तरोग
जैसे नहीं जातीं लड़कपन की बुरी आदतें।

उनके होने में बहुत सादा-सादा सा कालापन है
और जुबान में बहुत काली-काली सी सादगी
लक-दक पोशाकों में जगर मगर रोशनियों
और हाथ हिलाते पुतलों के बीच
ताजपोशी के लिये चले जा रहे है भेड़िये
और विश्वग्राम की भुक्खड़ जनता
अहर्निश चैनलों के सामने टकटकी लगाये बैठी है संज्ञाशून्य
देखती हुई खुदा में तब्दील होते भेड़ियों को।
विचारधाराएँ यों कहने को अब भी हैं मौजूद
और जनसंघर्षों की भी ज़ारी हैं बहुतेरी परियोजनाएँ बदस्तूर
पर सबसे बड़ा विचार है भेड़िया
यह कहना पहले से कहीं अधिक अब ज़रूरी नहीं रहा।

न्यूयार्क से लन्दन, इजराइल से पाकिस्तान,
बीझिंग से मास्को और भारत से संयुक्त राष्ट्र तक
भेड़ियों की इतनी बड़ी सफलताओं के पीछे
उनकी डील का सफल होना है
भेड़ियों की ताक़त और तादाद उम्मीद से अधिक बढ़ी है
कई पुराने विश्वस्त चेहरे, लड़ाकू विचार
अचानक इधर भेड़ियों में तब्दील हो गये हैं
और संसद से लेकर सड़क तक हर जगह
चल रही है अगले ताज की डील
मेरे देश की प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों की हालत
अब भी उसी मरखनी कुतिया जैसी है
जो अपनी पूँछ के नीचे झाँकने की जिद में
बासठ सालों से गोल गोल घूम रही है
यह जानने की निरर्थक कोशिश में
की उसकी पूँछ के नीचे ऐसा क्या ख़ास है
की ऐन जनतंत्र के महा मौसम में
अचानक बढ़ जाती है उसकी पूछ।

Friday, September 26, 2008

घर के लिए कुछ शिलालेख और ब्योरे

(1) घर
मध्ययुगीन कबीले
बीते जमानों की बात होगी कहीं
यहां नहीं
देखो ये नाखूनों और दांतों की विरासत
अभी-अभी तो कुचली गयी हैं अस्मिताएं
तभी ताजा हैं और लहूलुहान
देखो-देखो मेरी दुधमुंही बीमार बच्ची का दूध छीनकर
कैसे ठठाकर हँस रहा है राक्षस
इसकी आँखों की हब्शी चमक
कुछ याद दिलाती है तुम्हें ?
यह मेरा घर है
जहाँ पैदा हुआ मैं कुल कलंकी
आह ... मेरे पिता की सुंदर रचना !

Saturday, September 6, 2008

एक जिरह जबरदस्ती

समय के ऐसे भारी दिनों में
जबकि नपुंसक होते जा रहे हैं शब्द
और सच बोलना सिर्फ गूंगों की जिम्मेदारी है
अखबार पटककर
गुस्से से खौल उठता है मेरा मित्र विनोद
-‘‘ईमानदार वही है जिसे अवसर नहीं मिला है।
‘‘ ऐसे भयावह दिनों में कैसे लिखी जायेगी
कोई सही कविता
आंदोलित करेगी किसे ?
अंधेरे गहरे कुएं में जीवन की कला चीख रही है
और जगत पर बैठा बाजार
’चाहूँ तो निकाल दूँ’-वाली अदा से मुस्कुराता है
और कहता है -’पहले कपड़े उतारो !’

एक ऐसे बर्बर समय में
जब नरभक्षी गिद्धों और इतिहास के प्रेतों के शोर से
पृथ्वी घूमती हुई भँवर बनी जा रही
और आकाश शीशे -सा पिघल रहा
तब फूलों और पत्तियों और प्रेमिकाओं
और व्यभिचार के गुदगुदाते सौन्दर्य पर
लिखने और बोलनेवाले मेरे समय के अभिजन
लेखक, पत्रकार, प्रोफेसर और कविगण,
कार, कॉर्डलैस और कंडोम से लैस हैं
दुराचारी सत्ता और जनता के बीच डैस हैं
इनके डूबने के लिए चुल्लू भर पानी
अब भी इसलिये कम है
क्योंकि इन्हें आत्मा का नहीं
थोड़ी सुविधाएँ और जुटा लेने का ग़म है।

समय की एक ऐसी घड़ी में
जबकि सर्वाधिक जरूरी चीजें
हटा दी गयी हैं प्राथमिकताओं की सूची से
और तमाम बुनियादी बातें
अश्लीलता और शर्म से भर गयी हैं
एक ऐसी घड़ी में जबकि देश के सर्वोत्तम दिमाग
और रचनात्मक प्रतिभाएं
किसी भी राजनीतिक अथवा सांस्कृतिक समर में
घुसने से परहेज करती हैं
एक बार फ़िर जटिल और खुरदरे समय के
अपने प्रिय जटिल और खुरदरे कवि
मुक्तिबोध की जुबान में जुबान मिलाकर कहना चाहता हूँ
-’’हत्यारों के क्या लेखक साझीदार हुए ?’
या कि मनुष्य होना अब भी एक संभावना है।
राजेश चन्द्र

Monday, September 17, 2007

लडकियां बदल रही हैं

लडकियां बदल रही हैं

टैंक जैसे बंद घरों के बाहर
तेज़ रफ़्तार से भागती हुईं
देशांतर रेखाओं पर
सैंडल की धूल झाड़ती
बहुत-बहुत सी लडकियां
बहुत-बहुत तेज़ी से बदल रही हैं .

लड़के एकदम हताश परेशान हैं
गोकि लडकियां अब भी प्रेम कर सकती हैं
पर मुश्किल तो यह है
कि बहुत व्यस्त रहती हैं .

प्रेम का मनुहार करते हैरान हैं लड़के
अभ्यस्त लडकियां ना तो इनकार करती हैं
और ना ही स्वीकार करती हैं
बल्कि सिद्ध मुस्कानों और
चमकीले इशारों से बुनती हुई
भूलभुलैयों वाली पगडंडियाँ
एकांत के आईने में
चुपके-से मुस्कुराती हैं .

बदलती हुई ये लडकियां
कई-कई बार तुमसे या और किसी से
किसी महंगे होटल में
कॉफ़ी पीने के बाद
नरम रुमाल से हाथ पोंछते हुए
हर बार से कुछ अधिक ऊष्मा के साथ
अंदाज़ को कुछ और मौलिक बनाते हुए
कहती हैं

बस तुम्ही तो...
बाकी तो सारे अविश्वसनीय हैं
और बदले में तुम्हारी झेंपती-सी मुस्कान
पोल खोलती है कि
तुम्हारा विश्वास पहले से गहरा हुआ है ।

राजेश चन्द्र

Tuesday, September 4, 2007

फिर लौटेंगे तालिबान

यह मानसून फिर से
बीजों के बंद कपाट खोलेगा
नवांकुर फूटेंगे
धीरे-धीरे पसर जायेगी
सांस की धूप

झमाझम बारिश की तर्ज़ पर झूमते हुए
इन्द्रधनुषी अलंकारों से सुसज्जित
दिशाओं से उतरेंगे
केसर के रंग के ध्वजारोही
और आतंकित होने का अवकाश दिए बिना ही
वामन डग भरते नांप लेंगे
ज़्यादा से ज़्यादा उजास ।

साँसों को पहली अचरज से ताकतीं अबोध आँखें
जान भी नहीं पाएंगी
कि कब उनके सामने
खड़ी हो गयी एक दुर्भेद्य दीवार
और जब तन्द्रा टूटेगी
उन अनभ्यस्त हाथों मेँ होगी
अनुशासन की कोई प्रावेशिक किताब
धीरे-धीरे जो उन्हें
भूलभुलैयों की तरफ ले जायेगी

पहले उन्हें सड़क की बाईं या दाईं
तरफ चलना सिखाया जायेगा
फिर रंगों की सुरक्षित परिभाषा दी जायेगी
इस तरह जब तैयार कर लेंगे
वे अपनी चारदीवारियां
और गले मिलते हुए हरियाली गायेंगे

दबे पाँव, चौकन्ने
संसद, विधानसभाओं, मठों, मंदिरों
अकादमियों, सम्मेलनों, परिषदों
और सभा भवनों की
आरामदेह कुर्सियों से कूदेंगे

कई-कई १०८, १००८ प्रख्यात, सुकीर्त
मार्त्तंड , प्रचंड
स्वामी, आचार्य, जोशी, मोदी और वाजपेयी
और लीलते-चरते, खूँदते-लीदते सारी हरियाली को
प्रमुदित मन से आप्त वाक्यों मेँ डकारेंगे-

जो अमरीका के साथ नहीं है - आतंकवादी है
जो भाजपा के साथ नहीं -देशद्रोही है
जो हिंदू नहीं है- विदेशी जासूस है

फिर वे स्त्रियों से कहेंगे -
घर के अन्दर जाओ
घरों से फौरन हटा ली जायेंगी खिड़कियाँ
और दरवाजे बाहर से बंद रहेंगे
फिर वे शूद्रों के गले में ढोल बांधकर कहेंगे
गाँव से बाहर जाओ

और तब मौत की तरह के खुफिया सन्नाटे को तोड़ता
तेजोमय चिर-प्रतीक्षित अटल रामराज्य आएगा
दुंदुभी बजाता, शंखनाद करता, जयघोष कराता

और तब एक गौरवमय अतीत वाले
आध्यात्मिक और सांस्कृतिक हिंदू राष्ट्र की
कटी हुई जीभ वाली भूखी भीड़
या तो पूँछ हिलायेगी, या फिर झंडी
और लाउडस्पीकर की गगनभेदी चिल्लाहट
"जय श्री राम" के साथ
पीठ पर कोड़े खाता
एक पूरा का पूरा देश सुर मिलाएगा -
गों-गों-गों ।

राजेश चन्द्र
१७-०१-२००२



उनका देश

यह मेरा देश है
मेरे ही देश में
मेरे ही देश पर
अमरबेल की तरह चढ़ता हुआ
बुलंदियों तक बढ़ता हुआ
उनका भी एक देश है ।

...मेरा देश शताब्दियों के अँधेरे में
नींव-सा खड़ा है
उनका देश युगों से
दिव्य आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर
गुम्बद-सा जड़ा है !

राजेश चन्द्र

बच्चों की दुनियां

दूबों की नोक पर कांपती
ओस की बूंदों-सी हल्की नींद
तितली के पंखों-से मुलायम
और भोर के रंगों वाले सपने ...

ओ मेरी माँ ...
आगामी किन सदियों में
(अथवा आख़िरी सदी तक भी क्या)
पृथ्वी के तमाम बच्चों के लायक होगी
पृथ्वी के तमाम बच्चों की यह दुनियां ?

राजेश चन्द्र

Monday, September 3, 2007

संभावनाएं

जहाँ पिछली पीढ़ियों के पास
गढ़ने के लिये मिथक
और रचने के लिये
बेड़ियाँ हों केवल
तथा आगे की पीढियां उन्हें धारण कर लें
संस्कार की तरह

वहां संभावनाओं की भ्रूण-हत्या
इस तरह आम हो जाती है
जिस तरह सड़कों पर सम्भोगरत कुत्तों से सारी
गोपनीयता सरेआम हो जाती है ।

राजेश चन्द्र

पिता

आकाशगंगा से पथभ्रष्ट पुच्छलतारा कोई
जब गुज़रता है पृथ्वी के वायुमंडल से
ज्योतित पर वशीभूत
कितना लुभाती है उसकी आतिशी पूंछ
जो कि मीलों लम्बी हो सकती है
जितनी भी कोशिश कर लो
पकड़ में नहीं आती उसकी पूरी शख्सियत
कुल जमा हासिल राख और कंकड़ !
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पिता असहायता कब उतनी बुरी होती है
जितना कि झूठ
जैसे यही बात कि तुम्हारे सभी बच्चे
तुम्हारी नज़र में बराबर हैं -
पचने लायक है क्या तुम्हीं सोचो
तुमने और भी चार चार बच्चों को जन्म दिया
साजिश की बड़े बेटे के खिलाफ
यों तमाम उम्र तुमने भूल सुधार में गुज़ार दी
फिर भी दोषमुक्त नहीं हो सके ।
उस साजिश की पूरी एवजी वसूलते
शराब और गांजा और गाड़ी और फोन में
मस्त और तृप्त वह
सबको धकियाता कुचलता
आज भी अपने बच्चों के साथ
तुम्हारे ही कन्धों पर सवार होकर एंड लगा रहा है
और तुम उसके सैकड़ों अपराधों पर पर्दा
डालने की आज भी निरर्थक कोशिश कर रहे हो ।
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अकारण जूझ रहा हूँ मैं
अनावश्यक है मेरा ग़ुस्सा ऐसा कहते हो तुम
जब नहीं होता कहने को कुछ भी ।
जानता हूँ
असाध्य संकटों से घिरी हुई है दुनिया
और मैं भी उन्हीं में शामिल हूँ
जो भूख से बिलबिला रहे हैं
मर रहे हैं मार रहे हैं
हवा में मुट्ठियां लहरा रहे हैं
पर ना भूख मिट रही है
और ना मौसम बदल रहा है ।
इन बड़ी लडाइयों के दरम्यान
एक और छोटी- सी लडाई है
जिसे लड़ रहा हूँ मैं अपनी पत्नी और बेटी के साथ
उस आदमखोर शहर में
जो जीवित बचे रहने की
पूरी गिज़ा वसूल करता है।
दस बाई दस की मेरी दुनियां का एक मालिक है
जिसने दस महीनों के लम्बे इंतजार के बाद
ज़ब्त कर ली है मेरी दुनियां
ज़ब्त कर ली है
मेरी गृहस्थी, मेरी किताबें, मेरे कागजात
मेरी कविताएं , मेरा सारा अतीत, मेरे सपने
मेरा संघर्ष, मेरे होने के सारे सबूत
और यह सब कुछ उसके लिए
दस महीनों के किराए से ज़्यादा अहमियत नही रखता
अहमियत तो तुम्हारे लिए भी नही रखता
मेरे पिता
क्योंकि तुम्हें साबित करनी है अपनी वफादारी
उस बेटे के सामने
जिसे दूसरों की तबाही में नज़र आता है अपना रास्ता ।
घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलता हुआ महीनों से
आगे- पीछे टकरा रहा हूँ सिर
यह तुम्हारा ही घर है जहाँ बुलाया था तुमने हमे
भूख, जलालत, साजिशें और
कातिलाना हमलों को झेलते हुए भी
अकारण जूझ रहा हूँ मैं
अनावश्यक है मेरा ग़ुस्सा
जब तुम कहते हो तो सच ही होगा
सचमुच जल्दबाजी कर रहा हूँ मैं
दस महीने होते ही कितने हैं,
आत्महत्या से पहले यों भी
सबकुछ सामान्य ही लगता है।
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पिता मेरी ही भूल थी
मैंने तुम्हारा सम्मान लौटाना चाहा
तुमने मुझे सज़ा दी
मैंने तुम्हारी मुक्ति चाही-
तुमने मुझे ही जकड़ दिया।
हर बार मुझे बहलाकर तुम लौटाते रहे
तुमने कहा कि तुम समर्थ हो
सब कुछ तुम्हारी इच्छा से होता है
और फिर मैं मेरी पत्नी और बच्ची के साथ
भूख से और बीमारी से और लान्छ्नाओं से
तिल-तिल कर मरता रहा
क्योंकि तुम्हारी इच्छा थी
क्योंकि तुम समर्थ थे ।
मेरी भूखी मरणासन्न बच्ची
बूँद-बूँद दूध को तरसती रही
चार दिनों तक
तेज बुखार में बड़बड़ाती उस बच्ची के लिए
दवा तक नही खरीद सका मैं
क्योंकि तुम्हारी इच्छा थी
क्योंकि तुम समर्थ थे
क्योंकि तुम्हारा एक अदद बेटा था
और थे उसके तीन अदद
बड़े कोमल और कुलीन बच्चे
जिनके लिए दूध की नदियाँ बहाईं थीं तुमने
आज भी कहते हैं बिना दूध के
एक दिन में मुरझा जाते हैं जो
आदत होती ही है बड़ी खराब चीज़ !

और यातना से तोड़ कर मेरा वजूद
तुमने रखी रिहाई की एक घिनौनी शर्त
कि मैं कबूल कर लूं वे सब गुनाह
जो मैंने किये ही नहीं
तुमने शर्त रखी कि मैं
क्षमा याचना करूँ
उस बर्बर हिंस्र पशु से
जिसे शायद यह भी पता न हो कि
सच का जूनून क्या बला है
और कि
यह दुनियां रोज़ बनती है
उसके घुच्ची दिमाग से परे ।
तुमने यही भूल की मुझे पहचानने में
तुम नही जानते कि
एक अदना कम्युनिस्ट भी कितना मजबूत होता है
तुम भले ही भूल सको,
मैं कैसे भूल सकता हूँ यह सब मेरे पिता
जैसे करता रहा हूँ
आगे भी करता ही रहूँगा मूलोच्छेद
तुम्हारे जडीभूत सामंतवाद का
खोल डालूँगा तुम्हारे इस अन्धगह्वर के
दरवाज़े खिड़कियाँ
रोशनी आएगी पूरी की पूरी बेरोकटोक
और बाहर भाग जाएगी
सारी सीलन और सड़ान्ध !
पाखी.... मेरी नन्हीं बच्ची
तुमने और तुम सबने जिससे केवल नफरत की
एक दिन लौटेगी
वह जान रही होगी तुम सबकी असलियत
कैसे कर पाओगे उसका सामना
अपने-अपने चेहरों पर अपना घिनौना अतीत लिये
तुम सब दबे होगे जब
अपने ही असाध्य पापों के ब्याज से ।


राजेश चंद्र
--२३-२५ सितम्बर २००५ ( वीरपुर, सुपौल) ।

Wednesday, August 29, 2007

बेकारी

इस तराशी गयी दुनियां में
बेकारी
सबसे बड़ी नियामत नहीं भी हो सकती थी
अगर तुम्हें नींद में भी
वह सब करने दिया जाता
जो तुम सबसे बेहतर कर सकते थे दोस्त !

राजेश चन्द्र

गिरना

अंधेरों में
जो दूर तक देख पाते हैं
वे पास ही गिरते हैं
जो दूर तक नहीं देख पाते
वे भी गिरते हैं थोड़ी देर से !

राजेश चन्द्र

उम्मीद

हर उम्मीद
जो सपनों में पलती है
एक दिन
कुंठा में ढलती है !

राजेश चन्द्र

आदर्श

दूसरों के लिये बाप-रे-बाप
अपने लिये चुपचाप !


राजेश चन्द्र

बहाना

पहले मैं ढूँढता हूँ अपने लिए एक बहाना
और फिर लोग मुझे बहानों में ही ढूँढने लगते हैं !

राजेश चन्द्र

ख्वाहिशें

छोटा आदमी
छोटी ख़्वाहिशें
छोटी-छोटी ख्वाहिशों की ख़ूब लम्बी फेहरिस्त !

राजेश चन्द्र

आधी रात

दूर एक धड़धड़ाती हुई ट्रेन गुज़रती है
स्टील का बड़ा चम्मच
गिराता है चूहा किचन में
एक भटकी कोयल वहशत से चीख़ती है
खर्राटों में खलल डालता
चिहुँककर रोने लगता है एक दुधमुहाँ बच्चा
सास की लानत और
पति की चालाकी ढोती औरत
आदतन नींद में टटोलती हुई
बच्चे का मुँह लगाती है स्तन से
और बच्चा एक कदम और बढ़ाता है
बजबजाती हुई इस मक्कार दुनिया की ओर ।

राजेश चन्द्र

प्रक्रिया

उस सुबह को
बीती रात की याद नहीं थी
उस शाम
वह दिन ना जाने कहाँ गुम हो गया था

अगली सुबह यही हुआ
अगली शाम यही हुआ
उसकी अगली सुबह शाम भी यही हुआ

फिर उन तमाम सुबहों और शामों के साथ
यही चलता रहा !

राजेश चन्द्र

मध्यवर्ग

एक महंगा ब्यूटी सोप
केवल चहरे पर मलकर
महीनों बचाया जा सकता है


एक महंगी ब्यूटी क्रीम
महीनों बची रह सकती है
बशर्ते आप उसका महत्व समझें

टेलीफोन का बिल बचाया जा सकता है
अगर उसका लॉक नंबर सिर्फ आपको पता हो
मोबाइल फोन महंगा नहीं है
यदि उसे ऑफ़ रखा जाए
एक महंगा जूता बार-बार खरीदने से
बचा भी जा सकता है क्योंकि
ग़नीमत है
सस्ते मोज़े भी जूतों से बाहर नहीं दीखते

एक कलर टीवी इम्पोर्टेड
एक घटिया और सस्ते
स्टेबलाइज़र से भी देखी जा सकती है

बहुत सारे तरीके हैं
आपको बचाए और बनाए रखने के ।
शुक्र है कोई नहीं पूछता आपसे
आपके बच्चे के दूध ,
माँ-बाप की असाध्य बीमारियों,
आपके टॉयलेट की सफाई
और हरी सब्जियों के बारे में ।

यों आप खुशहाल दीखते हुए
मज़े में काट सकते हैं
किराये की सोसाइटी में अपनी तमाम उम्र ।

राजेश चन्द्र

केंचुल

इस जटिल और लगातार बदलते समय में
ख़तरनाक है एक जैसा दीखना


सबसे मिल-मिलाकर चलना
और गोल-मोल बतियाना
बदलते समय की सबसे बड़ी समझदारी है।

वे समझते हैं इस बात को
और समझ कर चलते हैं।
पहले गढ़ते हैं फिर बोलते हैं
या बोलकर बाद में गढ़ते हैं।

सच को झूठ की और झूठ को सच की
पूरी गम्भीरता से रखते हुए
वे बड़े चौकन्ने होते हैं
उनका हर बयान
इतनी गुंजाइश हमेशा रखता है
कि समय आने पर कहा जा सके
मेरा मतलब यह नहीं था।

वे इतने घुटे हुए और परिपक्व हैं
कि विचारधाराएँ उनके लिए
विविधताओं से भरे बहुरंगी कंडोम हैं
जिन्हें वे एक खास वक़्त में
पहनते और उतारते हैं।

यों अपने पूरे वजूद और इतिहास में
एक स्खलन जीते हुए
वे शान से काट लेते हैं
बिना केंचुल छोडे अपनी तमाम उम्र।


राजेश चन्द्र

भूगोल

पन्ने पर एक तरफ
कभी लिखी थी एक कविता समय सत्य
और उसमें लिखा था
सबसे अहम सवालों के बारे में।


पन्ने पर दूसरी तरफ
पत्नी ने लिखी एक और ज़रूरी कविता-
धनियाँ का पत्ता, मिर्च, अदरक,
लहसुन, जीरा, प्याज और एक किलो आलू ।

अब जबकि समय भी बदल गया है और उसका सत्य भी
और तमाम ज़रूरी सवाल
हाशियों पर चुटकुला बन रहे हैं,

ऊब और अनास्था के बीच
छिपाते हुए थोडी-सी आँच
और गढ़ते हुए जीने का कोई माकूल तर्क
दोनों कविताओं के बीच का भूगोल
हाँफते हुए नाप रहा हूँ।


राजेश चन्द्र

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